कितनी
लगन, कितनी तत्परता थी उस परम कारूणिक संत के हृदय में एक
आतुर साधक के जीवन को पूर्ण बनाने की ! कितनी कलायें वे
जानते थे भव-रोगों से दबे हुए अहं को ऊपर उठाकर उद्गम की ओर
उन्मुख करने की ! कभी-कभी पत्र पढ़ते-पढ़ते मैं पत्र-लेखक की
महिमा में स्वयं ही खो जाती थी- पत्र पढ़ना भूल जाती थी।
(देवकी माँ-पाथेय पुस्तक)
 |
| ॥ हरि: शरणम् !॥ |
॥ मेरे नाथ ! ॥ |
॥ हरि: शरणम् !॥ |
| ॥ God's Refuge ! ॥ |
॥ My Lord ! ॥ |
॥ God's Refuge ! ॥ |

पूज्य देवकी माँ के बारे में और जानने के लिए इस को पढ़ें।
एक
विलक्षण जीवन-वृत(Pdf)
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| S.No |
शीर्षक |
Title |
| 1A |
मानवका
जो जीवन है वह बड़े ऊँचे उद्देश्य से रचा गया है और
बड़ी अच्छी योजना है ‘उसकी’ | |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 1, page - 20) |
| 1B |
जिन
संकल्पों के शेष रह जाने के कारण तुम्हें जन्म लेने
के लिए बाध्य होना पड़ा उन संकल्पों को छोड़ दो | |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 2, page - 32) |
| 2A |
जिसको
अविनाशी चाहिए उसको नाशवान द्रश्यों में से अपनी
पसन्दगी हटा लेनी चाहिए | |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 3, page - 40) |
| 2B |
सर्व
समर्थ की महिमा का आधार लेने वाला दुर्बल से दुर्बल,
पतित-से-पतित साधक आगे निकल जाता है और गुणों का
अभिमान रखने वाला बड़े-से-बड़ा पंडित पीछे रह जाता है
| |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 4, page - 52) |
| 3A |
‘वह’
ज्यों का त्यों है, कभी मिटा ही नहीं, कभी मिटेगा भी
नहीं | अपना सम्बन्ध रखना है—एक से, और सबके प्रति
सद्भाव रखना है उस एक के नाते | |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 5, page - 73) |
| 3B |
द्रश्य
जगत में मेरा व्यक्तिगत कुछ नहीं है, द्रश्य जगत से
मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए – यह ज्ञान से सिद्ध
है और सर्व समर्थ प्रभु अपने हैं – यह विश्वास से
साध्य है | |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 6, page - 81) |
| 4A |
तुम
एक बार झूठ-मूठ को भी कह तो दो कि हे प्रभु ! मैं
तेरा ! तुम्हारी झूठी बात को भी सच्ची करने के लिए
वे इतने तत्पर रहते हैं,कि वे पकड़ लेंगे तो फिर तुम
छुड़ाना चाहो तो नहीं छोड़ेंगे | |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 7, page - 94) |
| 4B |
जो
अपने में ही है, स्वरूप में ही है, जिसमें तुम हो,
जो तुम में है, वह बाहर कहाँ मिलेगा ? कैसे मिलता है
? उसकी जरूरत अनुभव करो, तो वह तो एकदम तैयार खड़ा है
| |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 8, page - 117) |
| 5A |
सन्त–वाणी
की बहुत ही आवश्यक, मौलिक, अनिवार्य तीन बातें —
अकिंचन और अचाह हुए बिना शान्ति मिलेगी नहीं |
दूसरों के काम आये बिना करने का राग मिटेगा नहीं |
और प्रभु को अपना माने बिना स्मृति और प्रियता
जागेगी नहीं | |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 9, page - 118) |
| 5B |
भीतर
जो कमी महसूस हो रही है वह तो उस परम प्रेमास्पद परम
हितचिंतक का निमन्त्रण है कि भैया, तू रस कहाँ खोज
रहा है ? रस तो मेरे पास है | आ, मैं तुझे तृप्त
करूँ | |
जीवन
विवेचन भाग – 1 (प्रवचन 10, page - 134) |
| 6A |
मैं
सच्ची बात कहता हूँ तुम से, कि अधीर साधक की
प्रार्थना के वाक्य पूरे होते हैं पीछे और समर्थ
प्रभु उसकी बाँह पकड़ते हैं पहले | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 11, page - 12) |
| 6B |
जब
कोई व्यक्ति देखे हुए सुहावने, लुभावने संसार को
इन्कार करके उस बिना देखे को अपना मानना पसन्द करता
है, तो उसकी एक बहादुरी पर वे सर्वसामर्थ्यवान रीझ
जाते हैं | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 12, page - 24) |
| 7A |
समाज
की बड़ी-भारी सेवा हो जायेगी, अगर मनुष्य-मनुष्य के
भीतर यह विश्वास जग जाए कि वह अपना उद्धार इसी
वर्तमान में अपने द्वारा कर सकता है बहुत बड़ी बात है
| |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 13, page - 40) |
| 7B |
इस
दृश्य-जगत में ऐसा कुछ ठोस है ही नहीं कि तुम उसको
पकड़ कर अपने पास रख लो | वस्तु, व्यक्ति, अवस्था,
परिस्थिति आदि में कहीं पर ठहराव नहीं है, स्थिरता
नहीं है | भ्रम-ही-भ्रम है | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 14, page - 50) |
| 8A |
अगर
सचमुच आपके हाथ से प्राप्त सम्पत्ति का सदुपयोग होने
लग जाएगा, तो प्रकृति की उदारता का दरवाजा बहुत चौड़ा
हो जाएगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 15, page - 67) |
| 8B |
जिस
साधक ने कृपा-शक्ति का आश्रय लिया, उसको उन कृपालु
की कृपा शक्ति स्वयं ही जाल में से निकालती है | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 16, page - 79) |
| 9A |
हममें
से हर एक उस अनन्त परमात्मा की एक छोटी इकाई है, और
उसमें से जो बिजरूप मे; प्रेम तत्व विध्यमान है, उसी
के आधार पर हम अनन्त परमात्मा के प्रेमी होने जा रहे
है| इसमें अगर इस दृश्य जगत के भीतर हम लोग भेद बना
देंगे, तो हमारा उद्देश्य पूरा नहीं होगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 17, page - 83) |
| 9B |
मनुष्य
बुरा न रहे, अतृप्त न रहे, अभाव से पीड़ित न रहे,
पराधीनता में फँसा न रहे और अपने रसरूप उद्गम से
बिछुड़ कर रस के अभाव में दुनियाँ की धूल फाँकता न
फिरे —ऐसा संकल्प मेरे जीवन दाता का भी है | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 18, page - 96) |
| 10A |
जो
भीतर-भीतर है, वह अनमोल आनन्द, प्रेमरस, जो जीवन का
खजाना है, वह खुलता है कैसे ? “कुछ नहीं करने से” |
व्रत करो, उपवास करो, दान करो, काम करो, तीर्थ
यात्रा करो, जो भी कुछ करना है करो, लेकिन करते-करते
न करने की घडी आनी चाहिये | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 19, page - 106) |
| 10B |
जब
कभी भीतर से सूना-सा लगे, तो उस घडी का बहुत अच्छा
उपयोग करना चाहिए | अपने में खूब जागृति और चेतना
लानी चाहिए कि यह नीरसता तो मेरे रस स्वरूप
प्रेमास्पद प्रभु की याद दिला रही है | तो बाहर की
दौड़-धूप खत्म हो जाएगी | |
जीवन
विवेचन भाग – 1B(ख) (प्रवचन 20, page - 118) |
| 11A |
अनुकूल
परिस्थितियों की कामना ने मनुष्य को शान्ति से जीने
नहीं दिया | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 21, page - 11) |
| 11B |
मानव
के जीवन का कितना बड़ा भ्रम (illusion) है कि हमें
प्राप्त परमात्मा अप्राप्त मालूम होता है और कभी न
प्राप्त होने वाला संसार प्राप्त मालूम होता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 23, page - 20) |
| 12A |
>प्रेम
के आदान-प्रदान में प्रेमी के अस्तित्व का खो जाना
भगवत मिलन है | |
>जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 24, page - 30) |
| 12B |
जो
अभी है, अपने में है, सभी का है, सभी में है, उससे
अभिन्न होने में, काल अपेक्षित नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 25, page - 53) |
| 13A |
दिखाई
देने वाला सुहावना-लुभावना संसार मुझे नहीं चाहिए |
यह बनने-बिगड़ने वाली सृष्टि का सुख मुझे नहीं चाहिए
| |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 26, page - 67) |
| 13B |
कुछ
चाहोगे तो कुछ मिलेगा, कुछ नहीं मिलेगा और कुछ नहीं
चाहोगे तो सब कुछ मिलेगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 27, page - 68) |
| 14A |
जिसको
बनने-बिगड़ने वाला संसार चाहिए, उसकी कभी न मिटने
वाले अविनाशी परमात्मा में भक्ति नहीं जम पायेगी | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 28, page - 83) |
| 14B |
क्रियाशीलता
से शक्ति का हास होता है और विश्राम से, कुछ नहीं
करने से, अप्रयत्न होने से शक्ति संचित होती है | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 29, page - 93) |
| 15A |
सारी
सृष्टि बनाई उन्होंने आपके प्यार से प्रेरित होकर,
आपको सुख देने के लिए, और आपको बनाया अपने लिए | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 31, page - 118) |
| 15B |
इश्वर
का मिलन किस रुप में होगा, उस रुप की तुम अपनी ओर से
कल्पना मत करो, इसमें घाटा लग जायेगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 32, page - 123) |
| 16A |
लेने
की भावना जब तक अपने भीतर बनी रहेगी, शरीर और संसार
की पराधीनतासे मुक्त होनेकी सामर्थ्य नहीं आयेगी | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 33, page - 130) |
| 16B |
बिना
देखा, बिना जाना हुआ, उतना अपना नहीं लगता जितने ये
हाड़-माँस के पुतले अपने लगते है | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 34, page - 142) |
| 17A |
दूसरों
के साथ हम जो कुछ करेंगे, वही अनेक गुणा अधिक होकर,
अपने साथ होता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 35, page - 154) |
| 17B |
ईश्वर
में ही विश्वास करने वाले लोग, मरे हुए सम्बन्धियों
को नहीं भूलते हैं, और नित्य विद्यमान परमात्मा की
उनको विस्मृति हो जाती है | दुःख की बात है कि नहीं
? |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 36, page - 169) |
| 18A |
जो
भी कुछ करना है, करने के राग की निवृत्ति के लिए
हैं, अपने प्यारे की पूजा के लिए है | न मुझे शरीर
से कुछ चाहिए, न मुझे संसार से कुछ चाहिए | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 37, page - 182) |
| 18B |
परमात्मा
है और सभी का होने से मेरा भी है, सदैव होने से
मुझमें हैं, अभी है और मेरा है | इस स्वीकृति मात्र
से अहं में एक परिवर्तन होता हैं | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 38, page - 197) |
| 19A |
प्यारे
प्रभु ! तुम चाहे जैसे हो और तुम चाहे जहाँ रहो और
चाहे कुछ करो, तुम मेरे हो, मै तेरा हूँ | तुम भी
आजाद रहो, मैं भी आजाद हूँ | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 39, page - 213) |
| 19B |
मेरे
बिना चाहे और बिना किये जो कुछ हो रहा है, वह सदैव
ही हितकर है, ऐसा मान करके हमें उससे घबराना नहीं
चाहिए | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 42, page - 243) |
| 20A |
शुभ
कर्म करने के बाद भी शुभ कर्म करते रहने का राग,
कर्मों का फल, और कर्तापन के अभिमान, सबसे छूट
सकेंगे तो अशरीरी जीवन में प्रवेश होगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 40, page - 228) |
| 20B |
परिस्थिति विशेष का मनुष्य के जीवन में महत्व नहीं
है | परिस्थिति के सदुपयोग का महत्व है | |
जीवन विवेचन भाग – 2 (प्रवचन 41, page - 230) |
| 21A |
प्रभु
में विश्वास करना और उनका विश्वास उनसे माँगना दोनों
ही समान फलदायक होते हैं | साधक पथ के हारे हुए
साधकों के लिए यह संजीवनी है, पुनर्जीवन देनेवाला
तत्व है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 43, page - 10) |
| 21B |
जो
चाहती हूँ सो होता नहीं है, जो होता है वह भाता नहीं
है, जो भाता है सो रहता नहीं है, यह भी कोई जिन्दगी
है ? |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 44, page - 17) |
| 22A |
देखो
भाई, हम कैसे हैं, यह परमात्मा देखता नहीं है | हम
कैसे हैं, यह वह क्या देखे | हम जैसे हैं वैसे हैं |
एक बात उन्हें मालूम है पक्की तौर से कि उन्होंने
अपने में से ही हमारा निर्माण किया है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 45, page - 37) |
| 22B |
प्रेम
तत्व का हिसाब ऐसा है कि एक और एक मिलकर दो नहीं
होते | एक और एक मिलकर एक ही रहता है, शुद्ध अद्वैत
तो प्रेम तत्व में ही सिद्ध होता है | क्योंकि
प्रेमी और प्रेमास्पद दो नहीं रहते है| |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 46, page - 46) |
| 23A |
अनमोल
अवसर है, बड़ा अनमोल जीवन है | जो साधारण मानवता के
व्यवहार से भी नीचे गिरा देता है, ऐसे कामनाओं के
फेर में पड़े रहकर एक भी क्षण अपना बर्बाद न किया जाय
| |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 47, page - 60) |
| 23B |
आज
हम अप्राप्त की कामना और प्राप्त के दुरुपयोग में
बँधे हैं | इन दोनों ही भूलों को मिटा देना पड़ेगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 48, page - 66) |
| 24A |
हममें
क्या कमी हो गयी कि हम नाम लेते हैं भगवान का, और
आँख खोलते है तो संसार देखते हैं, और बन्द करते हैं
तो घोर अन्धकार ? |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 49, page - 75) |
| 24B |
मनुष्य
में यह सामर्थ्य है कि वह देखे हुए संसारको इन्कार
कर देता है कि नहीं.....नहीं..., मुझे नहीं चाहिये;
और बिना देखे, बिना जाने, परमात्मा पर, बिना किसी
शर्त के अपने को समर्पित कर देता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 50, page - 85) |
| 25A |
वह
दर्शन दे कि न दे, यह तो उनकी मर्जी पर छोड़ दो | वह
भक्त क्या जो भगवान को बाध्य करे कि तुमको दर्शन
देने के लिये आना पड़ेगा ? उसका नाम प्रेमी नहीं है
जो अपना संकल्प अपने प्रेमास्पद पर लादे | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 51, page - 106) |
| 25B |
क्षण
भर के सुखद आभास के लालच में अनन्त आनन्द पर परदा
डालकर हम बैठ जाते हैं | इस भूल को मिटा दीजिये |
अपने द्वारा अपने को सुख भोग का लालची स्वीकार ही मत
कीजिये | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 52, page - 116) |
| 26A |
अकेले-अकेले
बैठ करके विचार करते जाओ, जीवन के प्रति द्रष्टिकोण
बदलते जाओ, जीवन के सत्यको स्वीकार करते जाओ | भीतर
तो शांति विद्यमान ही है | खोजने कहीं बाहर जाना ही
नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 53, page - 131) |
| 26B |
जीवनके प्रति अपने
द्रष्टिकोणको बदल डालो और यह निश्चय करो कि काम किया जाता है विश्राम लिए होता सुंदर समाज निर्माण
लिया अपनी शान्ति, मुक्ति, भक्ति किये बिना न रहा जाये तो इस ध्येय को सामने रखकर काम करो कि
जो कुछ मैं कर रहा हूँ, वह सब विश्राम की प्राप्ति के लिये है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 54, page - 132) |
| 27A |
प्रेमास्पद है और
प्रेम बस हो गया उसी का सब स्वरुप की विभूति वही रह बाकी कुछ गलकर धातु में समा जैसे अन्य शरीरों
से तुम तटस्थ रहते हो, असंग रहते हो, उसी प्रकार से एक शरीर, जिसको तुमने अब तक अपने पास
समझा था, अपना माना था, उससे भी असंग रहो, तो तुम्हारी समस्या हल हो जाये | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 55, page - 155) |
| 27B |
जिस
दिन से सारे जगत को प्यारे प्रभु का मानकर प्रभु की
प्रसन्नता के लिये सेवा-कार्य किया उसी दिन से
कार्यकाल में और कार्य के बाद प्यारे प्रभु की याद
निरन्तर बनी रहने लगी है| |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 56, page - 164) |
| 28A |
जो
‘स्व’ के द्वारा ‘नहीं’ को ‘नहीं’ करके इन्कार करने,
और ‘है’ को ‘है’ मानकर स्वीकार करने का पुरुषार्थ
है, उसमें पराश्रय नहीं है, पराधीनता नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 57, page - 172) |
| 28B |
मैं
मनुष्य हूँ और यही मौका है, अलख, अगोचर, परमात्मा के
प्रेमी होकर उन्हें प्रेमरस प्रदान करके उनके साथ
प्रेम के आदान-प्रदान का आनन्द ले सकते हैं | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 58, page - 184) |
| 29A |
जो
सत्य है, जीवन का जो वास्तविक तत्व है वह बिना
पुकारे ही साधकों की मदद कर देता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 59, page - 200) |
| 29B |
जो
‘स्व’ में है वह आपका द्रश्य नहीं बनेगा और जिसको आप
द्रश्य के रूप में देखते हैं, वह आपके ‘स्व’ में
नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 60, page - 209) |
| 30A |
जो
सुख दूसरों को दुःख देकर प्राप्त होता है वह सर्वनाश
करता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 61, page - 218) |
| 30B |
अगर
असत्य की अस्वीकृति एवं सत्य की स्वीकृति – इस रूप
में आप सत्संग नहीं करते हैं, तो शरीर को लेकर के
कहीं भी चले जाइये | Challenge है कि संसार का
चिन्तन छूट जाये | नहीं छूटेगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 3 (प्रवचन 62, page - 238) |
| 31A |
हे
कृपालु ! अब आप अपनी कृपा से ही अपना विश्वास मुझे
दे दें | वे दे देंगे | आपको पता ही नहीं चलेगा कि
कैसे-कैसे उन्होंने विवेक-विरोधी विश्वासों को तोड़
दिया | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 63, page - 1) |
| 31B |
जिन
महानुभावों ने परमात्मा के प्रेम को बनाए रखने के
लिए जगत का सहारा छोड़ा तो परमात्मा इतने समर्थ, इतने
उदार और इतने प्रेमी स्वभाव के हैं कि उस व्यक्ति को
अपने गले लगा लेते हैं | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 64, page - 27) |
| 32A |
परम-व्याकुलता
ही परम प्रेमास्पद से अभिन्न कराने में अचूक साधना
है | जब और कुछ भी अच्छा नहीं लगता है – तो तत्काल
उसी क्षण में प्रेमी और प्रेमास्पद का मिलन होता है
| |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 65, page - 42) |
| 32B |
कोई
व्यक्तिगत जीवन को लेकर कोठरी में बन्द हो करके कुछ
को अपना, कुछ को पराया मानते हुए अगर किसी मन्त्र के
जाप से अपने को शान्त करना चाहे तो वैज्ञानिक
सिद्धान्त के विपरीत पड़ेगा | कभी शान्ति नहीं मिलेगी
| |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 66, page - 50) |
| 33A |
सचमुच
इस जगत में मेरा व्यक्तिगत कुछ नहीं है और वस्तुतः
मुझे अपने लिए कुछ चाहिए नहीं | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 67, page - 54) |
| 33B |
जो
कुछ चाहता है भगवान उसके पीछे खड़े रहते हैं और जो
कुछ नहीं चाहता है उसके वे सामने आ जाते हैं | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 68, page - 66) |
| 34A |
बाहर
की उथल पुथल से जो व्यक्ति अपनी सहज स्थिती से डोलता
नहीं, उसमें शान्त, स्थिर स्थित रह सकता है, उसमें
शरीरों से तादात्म्य तोड़ने की सामर्थ्य आ सकती है | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 69, page - 82) |
| 34B |
खुद
ही अचाह हुए बिना, अनन्त से अभिन्न होने के लिए
व्याकुल हुए बिना, वह सत्य उद्घाटित होता ही नहीं है
| |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 70, page - 93) |
| 35A |
भूतकाल
में मैंने जो कुछ भी किया होगा, सबके सहित उस
परम-पवित्र के हवाले अपने को कर दो तो वे परम-पवित्र
बना लेंगे और फिर प्रेम के आदान-प्रदान से हमें मस्त
कर देंगे | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 71, page - 115) |
| 35B |
सारे
संसार की सुखद संपत्ति से कहीं उपर इश्वर का विश्वास
है और फल, इश्वर के प्रति प्रेम है | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 72, page - 125) |
| 36A |
संसार
का चिन्तन कब छूटता है ? जब आप उसको अपने लिए आवश्यक
नहीं मानते तो छूट जाता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 73, page - 139) |
| 36B |
विवेक
के प्रकाश में जब हम इस बात को स्वीकार कर लेंगे कि
मेरा व्यक्तिगत कुछ नहीं है, तो फिर इस जगत से कुछ
पाने की कामना भी खत्म हो जायेगी | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 74, page - 141) |
| 37A |
कुछ-न-कुछ
करने की बात रहेगी, तो शरीरों से लगाव रहेगा | इसलिए
सब-कुछ करने के बाद, कुछ न करने वाली साधना हर
प्रकार के साधकों के लिए अनिवार्य है | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 76, page - 172) |
| 37B |
आलसी
नहीं रहोगे, अकर्मण्य नहीं रहोगे, विवेकी और प्रेमी
बनोगे, तो व्यर्थ चिन्तन का नाश होगा | व्यर्थ
चिन्तन का नाश होता है तो सार्थक चिन्तन उदित होता
है | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 75, page - 153) |
| 38A |
शरीर
के द्वारा अगर तुमको कुछ करना ही है, तो संसार के
हित को द्रष्टि में रखकर करो | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 77, page - 184) |
| 38B |
परमात्मा
ने मनुष्य की रचना ही इसलिए की कि उनको प्रेम के
आदान-प्रदान के लायक दूसरा कोई प्राणी मिला नहीं
संसार में | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 77, page - 189) |
| 39A |
अनित्य
जीवन में आकृति से भाव की उत्पत्ति होती है और
दिव्य-जीवन में भाव से आकृति की उत्पत्ति होती है |
|
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 79, page - 202) |
| 39B |
बुराई
रहित होना – स्थूल शरीर को शुद्ध करना है, अचाह होना
– सूक्ष्म शरीर को शुद्ध करना है और अप्रयत्न होना –
कारण शरीर को शुद्ध करना है | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 80, page - 216) |
| 40A |
संसार
के सम्पर्क में, सुखों के भोग में जीवनी शक्ति को
गँवा देने पर शान्ति, मुक्ति और भक्ति जिससे अभिन्न
होकर जीवन पूर्ण होता है, वह प्रोग्राम अपना शेष रह
जाता है और उसके पूरा होने से पहले प्राण-शक्ति खत्म
हो जाती है | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 81, page - 231) |
| 40B |
जो
कुछ हो रहा है, उससे परे कुछ ऐसा भी है कि जिसके
प्रकट हो जाने के बाद अपने को और कुछ करना शेष नहीं
रहेगा और कुछ पाना शेष नहीं रहेगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 4 (प्रवचन 82, page - 245) |
| 41A |
जितना
ही अधिक भोगे हुए सुख और अतृप्त वासनाओं का प्रभाव
होता है मस्तिष्क में, उतना ही व्यक्ति अपनेको
असमर्थ पाता है; अभाव और नीरसता से पीड़ित पाता है |
|
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 83, page - 10) |
| 41B |
एक
क्षण की शान्ति का आनन्द इतना गहरा होता है, उसमें
भौतिक और अलौकिक दोनों प्रकार की शक्तियों का ऐसा
विकास होता है कि उस जैसा अलौकिक जीवन का आनन्द
संसार की किसी प्रवृत्ति में कभी भी सम्भव नहीं है |
|
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 84, page - 31) |
| 42A |
मनुष्य
की इतनी बहादुरी है कि वह बिल्कुल निर्द्वन्द्व
होकर, निश्चिन्त होकर और बड़े अधिकार के साथ परमात्मा
को अपना सगा सम्बन्धी बना लेता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 85, page - 39) |
| 42B |
जो
इश्वर विश्वासी हर वस्तु को अपने प्यारे प्रभु की
मान लेता है, उसकी द्रष्टि जिस-जिस वस्तु पर पड़ती है
; उस-उस वस्तु के द्वारा उसे अपने प्यारे की याद आती
है और याद आने मात्र से उसके ह्रदय में प्रेम उमड़ता
है | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 86, page - 52) |
| 43A |
शरीर
की जरुरत मैं महसूस करूँ और प्राण-शक्ति खत्म हो
जाए, तो इसका नाम है मृत्यु | और शरीरों के
रहते-रहते, शरीरों से परे अपने अविनाशी अस्तित्व का
अनुभव कर लें और शरीर की आवश्यकता खत्म हो जाए तो
इसका नाम है जीवन-मुक्ति | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 87, page - 59) |
| 43B |
अगर
बिना देखे, बिना जाने, प्रेम स्वरुप परमात्मा से
(direct) सीधा विश्वास करके सम्बन्ध आप न मान सकें,
तो किसी भगवद-भक्त, अनुरागी संत के कहने से मान लेना
चाहिए | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 88, page - 81) |
| 44A |
अपनी
दुर्दशा से हमें जितना दुःख है, उससे सहस्त्र गुणा,
असंख्य गुणा अधिक करुणा, उस करुणा-सागर में उमड़ रही
है | हाय ! मेरा बच्चा, परम प्रेम का अधिकारी,
अविनाशी जीवन का अधिकारी, कहाँ भटक रहा है ? |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 89, page - 94) |
| 44B |
मरणशील
शरीर का प्रभाव अपने पर चढ़ जाए और आनन्द स्वरुप, रस
स्वरुप अमरत्व जो अपना जीवन है उसका प्रभाव अपने पर
से घट जाए, तो यह बड़े दुःख की बात है, और इसी गलत
द्रष्टिकोण को बदलने के लिए सत्संग का प्रोग्राम
होता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 90, page - 100) |
| 45A |
बड़ा
भारी पुरुषार्थ है मानव जीवन का, कि देखे हुए संसार
को इन्कार कर देना और बिना देखे हुए परमात्मा को सदा
के लिए अपना मान लेना | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 91, page - 114) |
| 45B |
सुख
लेने के लिए विधान ने आपको allow किया है या नहीं,
यह तो विधान जाने, लेकिन अगर आपने पसंद किया कि यह
तो बड़ी बढ़िया चीज है, केवल इस पसन्दगी के आधार पर
आपमें उसका राग अंकित हो जायेगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 92, page - 127) |
| 46A |
सेवा
करने वाले में राग की निवृत्ति हो जाए और जिसकी सेवा
की जाए, उसमें सेवा भाव जग जाए, तब तो समझना चाहिए
कि मैंने ठीक सेवा की और सेव्य में यदि लालच पैदा हो
गया, तो इसका मतलब है कि मैंने ठीक सेवा नहीं की | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 93, page - 142) |
| 46B |
परमात्मा
का नाम लिए बिना मनुष्यता की स्थापना कर देना, किसी
धर्म विशेष का नाम लिए बिना मनुष्य के जीवन में धर्म
की प्रतिष्ठा कर देना मानव-सेवा-संघ की अपनी
विशिष्टता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 94, page - 161) |
| 47A |
“मैं”
की उत्पत्ति अनन्त तत्व से हुई है, शरीर की उत्पत्ति
भौतिक तत्व से हुई हैं तो मेरे में और शरीर में
सजातीयता है ही नहीं, मूल से ही नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 95, page - 164) |
| 47B |
‘सुख
से दुःख दब जाता है सुख से दुःखों का नाश नहीं होता
|’ |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 96, page - 176) |
| 48A |
स्वामी
जी महाराज ने तीन व्रतों का उल्लेख किया है | (1)
सेवा करने के लिए सभी को अपना मानो ; (2) अपने सुख
के लिए किसी को अपना मत मानो | और (3) प्रेमी होने
के लिए केवल प्रभु को अपना मानो | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 97, page - 187) |
| 48B |
भौतिकवाद
की द्रष्टि से, शरीर संसार का है, इसलिए इसे संसार
की सेवा में लगा दो तो साधन हो गया | ईश्वरवाद की
द्रष्टि से यदि शरीर प्रभु का है, तो उन्हीं की पूजा
के रुप में, उनकी सृष्टि की सेवा में लगा दो, तो यह
साधन हो गया | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 98, page - 203) |
| 49A |
बड़ी
भारी समस्या है | जो देखने में आता है, वह पकड़ में
नहीं आता और जिसको सत्य-नित्य बताया जाता है, वह
देखने में नहीं आता | तो जो देखने में आए और मिले
नहीं और जो सदा-सदा से साथ है, मिला हुआ है वह दिखाई
दे नहीं, तो आदमी करे क्या ? |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 99, page - 212) |
| 49B |
विवेक
के प्रकाश में धर्मपरायणता को अपना लिया और अधिकार
लालसा को छोड़ दिया तो इतने ही से जीवन मुक्ति मिल
सकती है | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 100, page - 224) |
| 49C |
मूल
रुप से देखो, तो विदित होगा कि मानव मात्र की समस्या
एक ही है और उसका समाधान भी एक ही है कि ममता और
कामना छोड़ दोगे तो शान्ति अवश्य मिल जाएगी | इस
मौलिक सत्य को स्वीकार करो | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 101, page - 233) |
| 50A |
सदा
सदा के लिए निश्चिन्त और निर्भय होना चाहते हो तो एक
बार अपने सहित अपने पास जो कुछ तुमको दिखाई देता है,
सब उनके समर्पित करके शरणागत हो जाओ | प्रभु के
आश्रित हो जाओ, फिर तुमको कुछ करना नहीं पड़ेगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 102, page - 240) |
| 50B |
समाज
के साथ सम्पर्क पड़े तो जहाँ तक हो सके वहाँ तक ह्रदय
की मधुरता और प्रियता को, सदव्यवहार को, मीठे वचनों
को बढ़ाते रहिए, बढ़ाते रहिए | ह्रदय शीलता की वृद्धि
से विश्वास पन्थ में प्रभु विश्वास तथा समर्पण भाव
में बड़ी सजीवता आती है और इसीसे साधक के जीवन में
सफलता मिलती है, बहुत ही सही बात है | |
जीवन
विवेचन भाग – 5 (प्रवचन 103, page - 255) |
| 51 |
बड़ी
भारी भूल हो जाती है मनुष्य से कि वह सारी शक्ति, सब
समय रुचि-पूर्ति पर लगा देता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क) प्रवचन 1-2, page - 8) |
| 52A |
जहाँ
से दुःख आता है, उसको सहने की शक्ति भी वहीं से आती
है | किसी प्रकार की प्रतिकूलता आ गयी तो प्रभु की
कृपा मानो, उनके मंगलमय विधान का काम मानो | तो हर्ष
पूर्वक उसका स्वागत करो | जिसको दुःख का हर्ष पूर्वक
स्वागत करने आ गया, उसमें सुख की वासना रहेगी नहीं |
|
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क)
(प्रवचन 3, page - 49) |
| 52B |
जो
दूसरों के प्रति नुकसान पहुँचाने के लायक व्यवहार कर
देता है तो वह बल का अभिमानी अपना जितना नुकसान करता
है, उतना दूसरें का नहीं कर सकता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क)
(प्रवचन 4, page - 56) |
| 53A |
यह
जिसकी चीज है, उसके लिए रहने दो | तुम तो अपने पर
इतना ही उपकार करो कि परे चीज को अपनी मत मान लेना |
इतने ही उपकार से तुम्हारा कल्याण हो जाएगा | |
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क)
(प्रवचन 5, page - 78) |
| 53B |
शरीर
से सम्बन्ध रखेंगे और भगवान का भजन करना चाहेंगे, तो
भजन जबरदस्ती शरीर का होने लगता है | तो जिसने शरीर
को अपना माना उसके भीतर भगवत-भजन के काल में शरीर का
चिन्तन जबरदस्ती घुस जाता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क)
(प्रवचन 6, page - 90) |
| 54A |
सत्य
जिनके जीवन में अभिव्यक्त हो गया ऐसे अनुभवी संत के
पास बैठो तो पता नहीं कब कैसे या तो अपने भीतर अपनी
असमर्थता की ग्लानि में अहम् का अभिमान गल जाता है
या उनके जीवन का जो सत्य है वह अपने को प्रभावित कर
देता है और उतनी देर के लिए हम उस वास्तविक जीवन का
आनन्द लेते हैं | |
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क)
(प्रवचन 7, page - 111) |
| 54B |
थोड़े
दिनों के लिए जिन व्यक्तियों से सम्बन्ध बन गया है,
पता नहीं वह कब बिछुड जाए तो इस बीच में समझदार लोग
उस माने हुए सम्बन्ध को साधन-रूप बना कर जल्दी-जल्दी
जो आदर, प्यार, सम्मान, सेवा देने की है वह देकर के
सम्बन्ध की आसक्ति से मुक्त हो जाते हैं | |
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क)
(प्रवचन 8, page - 119) |
| 55A |
जो
शान्ति मुझे पसन्द है वह अपने ही में विद्यमान है,
तो जो अपने में है उससे अभिन्न होने के लिए बाहर की
सब इच्छाओं को, सब कामनाओं को, सब वासनाओं को छोड़
देना चाहिए | और फिर नई वासना पैदा होगी नहीं | |
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क)
(प्रवचन 9, page - 141) |
| 55B |
सारी
जिन्दगी अपने लिए समस्याएँ पैदा करते रहो और संसारसे
समस्याओं का समाधान पूछते रहो और माँगते रहो और रोते
रहो | यह तो मानवका जीवन नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6A(क)
(प्रवचन 10, page - 150) |
| 56A |
प्रभु
की शक्ति से प्रभु का काम हो रहा है इस बात का पूरा,
पक्का, विश्वास जिसको है, उसमें कर्तापन का अभिमान
नहीं आता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 11, page - 8) |
| 56B |
पहले
सत्संग करो | सत्संग के आधार पर जब असत् की स्वीकृति
निकल जाएगी जब सत्य की स्वीकृति तुम्हारा जीवन बन
जाएगी तब उसके बाद कोई कठिनाई नहीं होगी | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 12, page - 36) |
| 57A |
भला
काम करने से आदमी भला नहीं होता, लेकिन बुराई को
छोड़ने से आदमी भला होता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 13, page - 38) |
| 57B |
काम
छोटा बड़ा नहीं होता है साधक की द्रष्टि से | किसी भी
काम को इतनी लगन से करो, इतने ज्ञानपूर्वक करो, इतने
प्रेमपूर्वक करो कि करने का राग खत्म हो जाए और सत्य
से अभिन्न होने की आवश्यकता तीव्र हो जाए | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 14, page - 67) |
| 58A |
अपना
नित्य सम्बन्ध केवल ‘उसी’ से है | ऐसा जिन
इश्वर-विश्वासियों ने माना, उनके जीवन में इश्वर की
उपस्थिति का प्रत्यक्ष अनुभव हो गया | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 15, page - 73) |
| 58B |
मंगलकारी
प्रभु की मंगलकारिता पर विश्वास करो और जीवन के
अविनाशी तत्व पर विश्वास करो | अपने पुरुषार्थ के बल
पर जीवन पकड़ना चाहते हो और उसमें हारने से तुम निराश
होते हो यह बड़ी भारी भूल है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 16, page - 88) |
| 59A |
आज उपदेष्टा गुरु की आवश्यकता नहीं है संसार में |
आदमी इतना निर्बल हो गया है, इतना थकित हो गया है कि
आज तो वैसा गुरु चाहिए, जिसके सम्पर्क मात्र से
श्रोताओं की सब निर्बलता खत्म हो जाए | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 17, page - 110) |
| 59B |
राग
से भर के, द्वेष से भर के, और कुछ भोग की तृष्णा से
भर के हम निश्चिंतता की साँस ले नहीं सके |
निश्चिंतता से मर नहीं सके और जन्म-मरण के बंधन को
काट नहीं सके | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 18, page - 117) |
| 60A |
जिसने
पराश्रय और परिश्रम-जनित सुख को पसंद किया उसके
ह्रदय में से यह जीवन रस-स्त्रोत सूखता है, क्षीण
होता है | और यही कारण है, कि रास्ता दिखाई दे रहा
है और चलने में देर लग रही है | नहीं तो देर लगने की
कोई बात नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 19, page - 142) |
| 60B |
जिसने
पराश्रय और परिश्रम-जनित सुख को पसंद किया उसके
ह्रदय में से यह जीवन रस-स्त्रोत सूखता है, क्षीण
होता है | और यही कारण है, कि रास्ता दिखाई दे रहा
है और चलने में देर लग रही है | नहीं तो देर लगने की
कोई बात नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 6B(ख)
(प्रवचन 20, page - 142) |
| 61A |
सेवा
का अन्त अगर त्याग में हो जाए तो समझना चाहिए की
मैंने ठीक सेवा की और सेवा के बदले में अगर
अधिकार-लोलुपता जग जाए तो समझना चाहिए कि मैंने सेवा
नहीं की मजदूरी की | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 1, page - 14) |
| 61B |
व्यक्तियों
का समूह समाज है | एक-एक व्यक्ति अगर एक-एक जगह पर
सही हो जाए तो उस एक व्यक्ति से वहाँ का वायुमण्डल
सही हो सकता है | और एक-एक व्यक्ति अपने कर्तव्य में
दृढ़ हो जाए तो कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तियों का समूह जो
बनेगा, तो बहुत सुन्दर समाज बन सकता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 2, page - 20) |
| 62A |
काम
तो भले करो लेकिन काम किस लिए कर रहे हैं हम ? न
करने के जीवन में प्रवेश करने के लिए | सेवा
प्रवृत्ति में ज़रूर लग जाओ लेकिन सेवा प्रवृत्ति की
सफलता कब होगी | जब जीवन में सहज निवृत्ति आ जाए | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 3, page - 41) |
| 62B |
अल्प
शक्ति है, अल्प आयु है, कहाँ तक हम लोग असावधानी में
बिताएँगे, कहाँ तक हम लोग शिथिलता में बिताएँगे |
कितना महँगा दिन जा रहा है, आप स्वयं अपने से विचार
कर लीजिए | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 4, page - 49) |
| 63A |
अगर
देहातीत जीवन की आवश्यकता आप अनुभव करते हैं तो मैं
शरीर नहीं हूँ, शरीर मेरा नहीं हैं, इस सत्य को
हृदयंगम करो | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 5, page - 59) |
| 63B |
संत
अमर होते हैं, उनका नाश नहीं होता, उनके सत्य का नाश
नहीं होता, उनके प्रेम का नाश नहीं होता और जिस साधक
को जिस समय जैसी आवश्यकता रहती है वे उसको देते है | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 6, page - 73) |
| 63C |
जानी
हुई भूल नहीं करनी है, और की हुई भूल नहीं दोहरानी
है | कुटुम्बीजनों के अधिकार की रक्षा करनी है और
अपने अधिकार का त्याग करना है | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 7, page - 74) |
| 64 |
दूसरे
के अधिकार की रक्षा करने में कर्तव्य का पालन हो
जाता है और अपने अधिकारों के त्याग में राग और
आसक्ति खत्म हो जाती है | |
जीवन
विवेचन भाग – 7A(क) प्रवचन 8, page - 78) |
| 65A |
भगवत
चिन्तन होने वाली बात है | करने वाली बात यह है कि
मेरी जिन-जिन भूलों से जीवन में अनेकों विकार
उत्पन्न गए, उन भूलों का त्याग मैं करूँ | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 9, page - 98) |
| 65B |
अपने
जीवन में से बुराइयों का त्याग करो | विचार के आधार
पर अधिकार-लोलुपता और पद-लोलुपता का त्याग करो |
जिनसे सम्बन्ध मन उनकी सेवा करो और प्रेमी होने के
लिए प्रभु में विश्वास करो | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(क)
(प्रवचन 10, page - 109) |
| 66A |
तुम्हारे
पास सुख आए तो उसके भोगी मत बनो, उदारता पूर्वक उस
आए हुए सुख के द्वारा दुखियों की सेवा करो | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 11, page - 10) |
| 66B |
जो
भी कोई व्यक्ति संयोग-जनित सुख को पसंद करेगा, उसे
वियोग-जनित दुःख लेना ही पड़ेगा | कोई उपाय नहीं है
कि उससे वह बच सके | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 12, page - 26) |
| 67A |
विधि-पूर्वक
काम करना, पवित्र भाव से काम करना, निष्कामता पूर्वक
काम करना और लक्ष्य पर द्रष्टि रखकर काम करना इन
चारों बातों का पालन करते हुए जो लोग अपना कर्तव्य
निभाते हैं, उनको कर्तव्य के अन्त में स्वतः अन्दर
से शान्ति अनुभव में आती है और उस शान्ति में वे
स्थित होकर योगवित हो जाते हैं | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 13, page - 41) |
| 67B |
संसार
से कुछ चाहिए तो वह चाह कहलाता है | संसार ने जो
दिया है, उसका सदुपयोग करो तो वह साधन कहलाता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 14, page - 54) |
| 68A |
किसी क्षण में भगवान तुम्हारे सामने प्रकट दिख गए,
दर्शन मिल गया तो इसको तुम साधन की सफलता मानो तो यह
बेकार की बात होगी | क्यों ? क्योंकि इसी पर साधक की
द्रष्टि अटक जाएगी | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 15, page - 72) |
| 68B |
संसार
के साथ रहने पर भगवान की याद आती है | और भगवान के
साथ रहने पर संसार को भूल जाता है आदमी | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 16, page - 83) |
| 69A |
प्रतिकूलता
में अपने संकल्पों का त्याग सब को करना ही पड़ता है |
बिना छोड़े काम नहीं चलता | लेकिन संकल्पों की पूर्ति
की अनुकूलता सामने आए और उस समय भी सावधानी पूर्वक
मैं निःसंकल्प रह सकूँ, तो कदम आगे बढ़ सकता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 17, page - 100) |
| 69B |
इस
शरीर पर मेरा स्वतन्त्र अधिकार नहीं है, यह मेरा
नहीं है तो किसका है ? प्रकृति का है, परमात्मा का
है, जिसका भी मानो | जगत का है तो उसके लिए इसका
उपयोग करेंगे | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 18, page - 124) |
| 70A |
साधक
की द्रष्टि जिस क्षण से वास्तविक जीवन की ओर चली
जाती है, अनन्त परमात्मा की ओर चली जाती है, उसी
क्षण से उसके भीतर की नीरसता का और निराशा का नाश हो
जाता है | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 19, page - 134) |
| 70B |
अपने
भीतर जो अविनाशी तत्व विद्यमान है, उसके प्रकट हो
जाने में जो जीवन है, वह संसार से सम्पर्क बनाने में
नहीं है | |
जीवन
विवेचन भाग – 7(ख)
(प्रवचन 20, page - 157) |
सभी
प्रवचनों का शीर्षक दिया जा चुका हैं, फिर भी कोई साधक
अपनी तरफ से शीर्षक देना चाहते हैं तो उनके सुझाव सादर
आमंत्रित हैं।
॥
हे मेरे नाथ! तुम प्यारे लगो, तुम प्यारे लगो! ॥
॥ O' My Lord! May I find you lovable, May I find you
lovable! ॥
|